Nirbhaya
Gang rape incident has completed one year. It has been a remarkable year for
the journey of gender discourses in India. In recent past, we have rarely seen
such a diversified debate on various aspects and issues of sexual violence
against women. Main stream media and other alternative
public spheres have also enthusiastically and overwhelmingly participated in
these discussions and debates and one has to admit that on several occasions,
these spheres gave decisive directions to the discourse of sexual violence.
With that, importance of last year also resides in the fact that different
connotations of these debates have constructed and developed a certain kind of
language, evaluation of which is largely ignored. This 'linguistic
construction' is so important that many relevant conclusions on the politics of
gender discourses can be drawn from it.
Sunday, 13 July 2014
Thursday, 8 May 2014
हल्केपन से भरी - गंभीरता !
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| (गूगल-तस्वीरों के भंडार से ) |
मुझे नहीं
पता कि यह बहुत गंभीर बात है या नहीं, पर हाँ इतना पता है कि बात सोचने पर मजबूर
ज़रूर करती है. मेरे लिए यह सवाल तब खड़ा होता है जब मेरे कानों में किसी बड़े
विद्वान की किसी गहन सोच विचार के बाद कही किसी गंभीर बात के अंत में यह आवाज़ भी
सुनाई देती है कि, ‘चलिए बहुत हुई गंभीर बातें अब थोड़ा माहौल को हल्का किया जाए.’ आजकल
गोष्ठियों, आयोजनों, अखबारों, समाचार चैनलों में बात को ‘हल्का’ कर देने की कोशिश
साफ़ नज़र आती है. एक उदाहरण के तौर पर इसको साफ़-साफ़ तब भी देखा जा सकता है जब
प्राइम टाइम पर बोलते बेहद जिम्मेदार दिखने वाले एंकर यह कह कर खुश होते हैं कि
‘चलिए बहुत गंभीर बातचीत हो गई अब माहौल को हल्का करने के लिए देखते हैं थोड़ा ये
और थोड़ा वो.’
Saturday, 3 May 2014
कुछ कहते हैं ये चेहरे..
जिंदगी है ये,
जीना चाहिए जिंदगी की तरह,
जीना चाहिए जिंदगी की तरह,
पर शायद है कुछ जहर-सा,
पी रहे हैं, जाने किस तरह!
कहना तो ये भी चाहते हैं बहुत कुछ,
पर चुप रह जाते हैं किसी असहाय प्राणी की तरह,,
सोचते हैं कि अगर यही जिंदगी है तो जी लेंगे,
जहर है तो क्या हुआ पी लेंगे!
Saturday, 18 January 2014
Partner : What Is Your Politics?
An open letter to Mr. Arvind Kejriwal
Congratulations
to you Mr. Arvind Kejriwal for becoming Chief Minister of Delhi. Before coming
into power you were talking about 15 days to show people what changes you can
make to this politics and to this state. I, as a citizen gave you that
particular time which you asked ‘Me’ as a citizen to give you. You are the most
‘talked about’ political party this Indian country has ever witnessed, the
party who talks about ‘public interest’ and not just that but the party who has
the arrogance of understanding and solving the so called problems of public.
People have been talking about you constantly but I kept silent to see what
changes you are making, and you actually made changes that I could see and I am
seeing it even now.
Sunday, 5 January 2014
मेरी आँखों का सपना
साथ ही एक प्यारा-सा एहसास लाने वाला था,
वह आता इससे पहले ही ‘किसी ने’ उसे रोक कर कुछ कहा था,
सुन कर उसकी बात को सपना मेरा जाने लगा,
घबराकर रोका था मैंने उसे,
पूछा, ‘तुम
तो मेरी आँखों में आने वाले थे!
तुम तो मेरे जीवन को रंगीन बनाने वाले थे!
फिर क्यों वापस जा रहे हो?
Monday, 16 December 2013
महिला विमर्शों का भाषायी रुख
निर्भया
बलात्कार कांड को एक साल पूरा हो गया है। भारत में महिला विमर्शों का रुख तय करने
के लिहाज से यह एक साल बहुत महत्वपूर्ण रहा है। न सिर्फ बलात्कार, बल्कि महिलाओं से जुड़े यौन हिंसा के हर
छोटे-बड़े मामले को केंद्र में रखकर चलायी गयी बहसों ने महिला विमर्शों के इतिहास
में एक सुनहरा अध्याय जोड़ा है, इसमें
शायद ही कोई संदेह है। मुख्य धारा मीडिया और वैकल्पिक जन दायरों ने बढ़-चढ़कर इन
बहसों में हिस्सा लिया और कहना होगा कि कई अवसरों पर निर्णायक रूप से अपना प्रभाव
भी छोड़ा। लेकिन इसके साथ-साथ बीते एक साल का महत्त्व इस बात में भी है कि इस दौरान
बलात्कार और यौन हिंसा से जुड़े विमर्शों ने एक खास तरह की भाषा का सृजन किया है।
यह भाषा कई अर्थों में खास है और इसके मूल्यांकन से महिला विमर्शों की दिशा और
उसकी राजनीति के बारे में महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।
Tuesday, 3 December 2013
बन्द गली के पार !!
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| अनंत की झलक! (-अपने कैमरे से खींची गई तस्वीर) |
हाल ही में परीक्षा संबंधी कुछ शर्तों
को पूरा करने के लिए मैं और मेरे कुछ मित्र दिल्ली के द्वारका इलाके में गए थे।
वापसी के दौरान एक मित्र का फोन बजा। उसने हमसे कुछ दूर जाकर थोड़ी देर बात की।
हमें उस बातचीत में से राममनोहर लोहिया अस्पताल, डॉक्टर, जान-पहचान जैसे कुछ शब्द सुनाई दिए। वह
बातचीत खत्म कर लौटा तो इन शब्दों को सुनने के बाद मैंने उससे पूछ लिया कि ‘क्या हुआ? सब ठीक तो है न!’ उसका जवाब था कि किसी ने आत्महत्या की
कोशिश में छत से छलांग लगा दी है और अभी उसके तुरंत इलाज के लिए जान-पहचान की
जरूरत है। आत्महत्या की स्थिति तक पहुंचने वाले लोगों के संबंध में मेरा मित्र कुछ
अलग विचार रखता था, इसलिए उसने ‘कायरता’ और ‘बुजदिली’ जैसे कुछ शब्दों में पूरे मसले को बांध दिया और यह वाकया महज
चार-पांच मिनटों में आया-गया हो गया।
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