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Friday, 8 July 2016

एक और बसंत बीत चला


देख लिया बदलते मौसमों का एक पूरा चक्र,

अब झर जाना चाहिए पतझर का बहाना कर कि,

जिसमें (अपनी उम्र जी चुका?) पत्ता धीरे - से शाख छोड़ देता है,

जिस पर पीले पड़ जाने का फ़िज़ूल आरोप लगा देते हैं लोग..

पतझर का झरा हुआ पत्ता पीला नहीं होता..

कभी देखना उसे, वो सुनहला होता है..

एक उम्र जीने के बाद वो निखर जाता है..

तुम उसके सुनहलेपन को पीलापन कहकर गिरा देने का बहाना बना लेते हो...

वो पत्ता जो अपनी सारी नमी तुम्हारे नाम कर चुका..

तुम उसे सख्त और रुखा कह देते हो..

Saturday, 3 May 2014

कुछ कहते हैं ये चेहरे..




जिंदगी है ये,

जीना चाहिए जिंदगी की तरह,

पर शायद है कुछ जहर-सा,

पी रहे हैं, जाने किस तरह!

कहना तो ये भी चाहते हैं बहुत कुछ,

पर चुप रह जाते हैं किसी असहाय प्राणी की तरह,,

सोचते हैं कि अगर यही जिंदगी है तो जी लेंगे,

जहर है तो क्या हुआ पी लेंगे!

Sunday, 5 January 2014

मेरी आँखों का सपना



झिलमिलाहट - अपने कैमरे से
उस वक़्त मेरी आँखों में एक सपना आने वाला था,
साथ ही एक प्यारा-सा एहसास लाने वाला था,
वह आता इससे पहले ही किसी नेउसे रोक कर कुछ कहा था,
सुन कर उसकी बात को सपना मेरा जाने लगा,
घबराकर रोका था मैंने उसे,
पूछा, ‘तुम तो मेरी आँखों में आने वाले थे!
तुम तो मेरे जीवन को रंगीन बनाने वाले थे!
फिर क्यों वापस जा रहे हो?