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Saturday, 23 January 2016

The Despair

'Soul-mate' Art piece (Artist - Unknown),  Photo - Preeti Tiwari

मुझे नहीं हासिल करना किसी का प्यार जीवन में,
प्यार हासिल करना कभी लक्ष्य नहीं हो सकता,
वह होता है,
मिलता है,
टाइम फ्रेम में उसे पाना नहीं होता..

भरपूर दोस्त,
भरपूर लम्हें,
भरपूर ज़िंदगी,
जिया,
भरपूर जिया,
पर खुद से हासिल क्या !

मेरे हासिल अलग थे,
मेरे हासिल अलग हैं,
बस बैठना है सुकून से अपने दोस्तों के साथ,
फिर धीरे से छेड़ना है उनमें से किसी को मुस्कुराते हुए,
फिर मजाक उड़ा कर तालियाँ बजा कर हँसना है,
फिर पड़ने वाली मार के डर से तेज़ी से उठ के भागना है,
और
फिर धीरे से भूल जाना है कि वो पल तब्दील हो गया है बचपन वाली मारम-पिट्टी के खेल में|

Sunday, 17 January 2016

रंगमंच की दीवारें

मैं 2007 से लगातार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (रानावि/एनएसडी) जाती रही हूँ. इसके पीछे वजह यह कभी नहीं रही कि मुझे भविष्य में अभिनय की दुनिया से जुड़ना था. यह भी नहीं कि मुझे नाटकों पर बड़े लेख लिखने थे या किसी बड़े विश्वविद्यालय के विभाग में ‘नाटक विधा की महत्ता और उपयोगिता’ जैसे किसी विषय पर पीएचडी करनी थी. यह वह समय था जब मुझे इस बात की जानकारी भी नहीं थी कि ‘नाटक’ को पाठ्यपुस्तक के जरिए पढ़ा भी जाता है. हाँ, ‘अभिनय एक कला है, जिसे सीखा जाता है’ यह मुझे ज़रूर पता था. लेकिन इस बात का मेरे नाटक देखने से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं था.

'मुझे नाटक देखना अच्छा लगता है.' बस इतनी-सी वजह! इतनी वजह पर्याप्त होती थी सत्तरह अठारह की उम्र में सलमान खान – शाहरुख खान की फिल्में देखने के बाद और अपने दोस्तों के बीच ‘कूल’ बनने के बाद भी उस भीड़ से निकल कर एनएसडी तो कभी श्री राम सेन्टर के बाहर लाइन लगाने के लिए. नाटक मेरे लिए एक समान्तर दुनिया है. हाँ एक बात और कि फिल्मों के लिए दोस्तों का झुण्ड भले ही मिल जाता हो पर नाटक के लिए शायद कभी कोई इक्का - दुक्का तैयार होता था. मैंने दस में आठ दफे खुद को अकेला पाया. शिकायत बिल्कुल नहीं. अकेले घूमने से मैंने यूँ भी कभी परहेज़ नहीं किया. 

नाटकों को देखने के लिए, ‘पहले आयें-पहले पायें’ जैसी अवधारणा ने भी मुझे कभी नहीं रोका. नाटक की टिकट कतारों में मैंने खुद को हमेशा पाया. नाटक के सिलसिले में मैं कहीं ज्यादा भावुक हूँ. अपने साथ किसी को ले जाऊं और देख कर कोई कह दे कि, “बोरिंग था!” या “फिर ये क्या दिखा दिया यार!” जैसे जवाब कल्पना में भी आहत कर जाते हैं. नाटकों को लगातार देखने ने नाटक की समझ पैदा की. मैंने देखा. कभी थोड़ा समझ आया, कभी वह भी नहीं. धीरे-धीरे समझ आने लगा. यह समझ मुझे किसी पाठ्यपुस्तक से नहीं मिली. अब भी वजह वही थी. 'नाटक देखना अच्छा लगता है'.

बापी बोस द्वारा निर्देशित 'मुक्ति' नाटक का एक दृश्य ( मुक्तिबोध के जीवन पर आधारित) फोटो - प्रीति तिवारी

Thursday, 14 August 2014

काश! तुम न लौटतीं वक्त पर...

मेरा यह कहना नादानी लगेगी आपको, यह हरकत बचकानी लगेगी आपको, पर सच तो यह है कि गलती आपकी है... आप सभी की है.. आप गुनाहगार हैं मेरे.. ऐसा कहने के पीछे कोई तर्क नहीं है, मेरे पास कोई सबूत नहीं है, बस एक निराशा है, कोरी निराशा!! काश.. काश तुम न लौटतीं वक्त पर!!

 'मैं' सभी लड़कियों की बात कर रही हूँ और सभी से कर रही हूँ. हाँ तुम से जो अपने पिता का हुक्म मान कर घर से बाहर ही नहीं निकलती हो..
हाँ, तुमसे भी जिनके भाई ज्यादा दिलदार बनते हैं और कहते हैं कि जाओ पर शर्त यह है कि शाम चार बजने से पहले घर लौट आना वरना आगे से मैं तुम्हारा साथ नहीं दूँगा और तुम उनकी इस शर्त को मान लेती हो..
हाँ, तुम भी मैडम जो अपने आप को बहुत 'मॉर्डन' समझती हो और शाम को 6 से 7 के बीच घर पहुँच कर अपनी हाजिरी लगाती हो..

तुम सब गुनहगार हो मेरी! हाँ, तुम सब क्योंकि तुम घर वापस लौट कर उस रास्ते को मेरे लिए अकेला कर जाती हो जिस पर देर रात बहुत से मर्द चला करते हैं पर 'मैं' चाह कर भी नहीं चल पाती..
हाँ तुमने उस रास्ते को शाम से पहले अकेला कर छोड़ने का वह काम किया है जिससे उस सड़क पर चलती हुई 'मैं' अजनबी-सी दिखाई देती हूँ..