![]() |
| पंडित बुद्धदेव दासगुप्ता (मध्य) अपने सह कलाकारों के साथ. |
‘संगीत’ शब्द कई मायनों में अन्य शब्दों से अलग
है. ऐसा कहने के पीछे एक बड़ा कारण यह है कि जिस तरह तकरीबन हर शब्द को सुनने के
साथ ही कई तरह की तय परिभाषाएँ दिमाग में घूमने लगती हैं वैसा ‘संगीत’ शब्द सुनने के बाद नहीं होता बल्कि ‘संगीत’ शब्द सुनने के बाद कानों में कई तरह की
ध्वनियां बज उठती हैं जिनका सम्बन्ध किसी भी परिभाषा से नहीं होता. शायद यही वजह
रही होगी जिसकी वजह से तमाम कोशिशों के बावजूद ‘संगीत’ को परिभाषाओं से परे माना जाता है.
